वैज्ञानिक अध्यात्मवाद

admin/ September 29, 2020

विद्वानों के मतानुसार ‘आवश्यकता हीं आविष्कार की जननी है’ अर्थात् बिना आवश्यकता के प्रायः किसी भाषा, विषय, जीवन पद्धति, साधन, सुविधा का सृजन नहीं होता है।

सृष्टि के प्रारम्भ काल से निर्माण एवं विध्वंश का कार्य अनवरत रूप से चलता रहता है। दो स्तरों पर निर्माण होता है एक प्रकृति ;ईश्वरद्ध तथा दूसरा मानव द्वारा। जीवन को सरल, सुगम, गतिशील, उन्नत बनाने के लिए ही मानव विभिन्न प्रकार की रचनाओं में लगा है। प्रकृति ने हवा, पानी, अनल, आकाश, प्रकाश, धरती अर्थात् पंचभूतों के साथ नदी, पहाड़, पेड़, अंडज, पिन्डज, स्वदेज,उद्भिज की रचना की है। उसी क्रम में हम जानते हैं अथवा जानना भी चाहिए की मानव भी भोजन, वस्त्र, आवास, कल-कारखाने, भौतिक सुविधाओं, ग्रन्थ, संत, पंथ, उपासना, विविध निर्माणों में लगा है। शिक्षा, संस्कार, तकनीक, जानकारी के अभाव में मानव विकास नहीं कर सकता है। 

जिस प्रकार पक्षी दो पंखों के सहारे ही अपने जीवन को जी सकता है अन्यथा परकटे गिद्ध की तरह जमीन पर गिरने, लोटने तथा अस्तित्व मिटने के कगार पर आ जाता है, उसी प्रकार मानव भी भौतिक साधनों तथा आध्यात्मिक उपायों ;सस्कारोंद्ध रूपी दो पंखों के सहारे ही सफल जीवन जी सकता है अन्यथा असम्भव नही ंतो दूभर जीवन हो ही जाता है।

उपर्युक्त बातों के विवेचना से ही स्पष्ट होता है कि मानव जीवन दोनों शक्तियों एवं आधारों पर ही अवलम्बित है। जीवन के पुरूषार्थ चतुष्ट-अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष का विश्लेषण करने पर निष्कर्ष प्राप्त होता है कि मोक्ष प्राप्ती का एक मात्र साधन अध्यात्म ही है। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद जांचा-परखा अध्यात्मवाद ही वैज्ञानिक अध्यात्मवाद कहा जा सकता है। आधुनिक युग वैज्ञानिक युग है। विज्ञान ने जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित किया है। विज्ञान का विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण होता है जिसका प्रथम सोपान वर्गीकरण होता है। किसी विषय या वस्तु को टुकड़े-टुकड़े करके देखने में ही विज्ञान की सफलता है। जीवन के प्रति समग्रदृष्टि विज्ञान के पास नहीं है। फिर भी ज्ञान विवेचन की मात्र यही दृष्टि रह गयी है।

जीवन एवं समाज के सभी पक्षों के अध्ययनार्थ आज अनेक विज्ञान शास्त्र या विषयों की अपनी – अपनी सीमायें है। यों उन विषयों में एक ही भाषा एवं शब्दावलियों का प्रयोग किया गया है। लेकिन एक ही अर्थ में नहीं भिन्न अर्थ में । तात्पर्य यह है कि वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का भावार्थ सार्थक हो। टुकड़े-टुकड़े करने की वैज्ञानिक पद्धति अक्षरशः लागून हो।

भारतीय जीवन पद्धति तथा मानव जीवन पद्धति में दिशाहीनता से युक्त जीवन पद्धति हो गई है। भौतिकता तथा उपभोक्तावादी, संवेदनहीनता से युक्त जीवन सर्वोपरि होता जा रहा है। सम्प्रति मानवता तथा प्राणी मात्र के विनाश से बचाने के लिए भारतीय जीवन दर्शन के श्रेष्ठता को प्रगट करने वाले अध्यात्मवाद का पठन-पाठन, प्रशिक्षण आवश्यक ही नहीं नितान्त आवश्यक है। आधुनिक चिन्तकों को वैज्ञानिक अध्यात्मक को प्रचारित, प्रसारित कर मानवता की रक्षा करनी है। जो अध्यात्म नर को नारायण-दानव को देवता बना चुका है उसके अवैज्ञानिक होने का प्रश्न हीं नहीं उठता। महापुरूष, संत, ऋषियों का आद्योचीत विश्लेषण काने पर ज्ञात होता है कि अध्यात्मवाद में कितनी शक्ति तथा अदोष पद्धति है। शिवी, दधिचि, हरिश्चन्द्र, महर्षि विश्वामित्र, संत रविदास, आचार्य श्रीरामशर्मा अध्यात्मवाद के श्रेष्ठ संस्करण हैं।

परिभाषाएॅ:- अध्यात्मवाद तथा वैज्ञानिक अध्यात्मक समरूपता भावार्थ को प्रकट करते है। ‘‘सहजमार्ग के संस्थापक श्री राम चन्द्र जी ने बताया है कि ‘वास्तव में अध्यात्मिकता वहाॅ से प्रारम्भ होती है जहाॅ से ;कर्मकाण्डद्ध धर्म का अन्त होता हैं।’ धर्म मनुष्य को प्रारम्भिक शिक्षा तो दे सकता है, परन्तु उसकी व्यस्कअवस्था में उच्चत्तर प्रगति तो केवल अध्यात्म द्वारा सम्भव है।’’ अध्यात्म अपने सभी पहलुओं में रहस्यवाद के समकक्ष माना जा सकता है। धर्म ईश्वर की खोज में लगे मनुष्य के मन को बर्हिमुख करता है रहस्यवाद या अध्यात्मवाद खोज को अन्तर्मुख करता है। अध्यात्मिकता हमसे जो अपेक्षा करती है वह बस यह है कि हमारा ध्यान अंदर के उस ‘पुरूष’ पर केन्द्रित रहे। अध्यात्म मनुष्य जीवन के ध्येय को प्राप्त करने का कहीं आसान तरीका है। अध्यात्म ईश्वर का कोई नामकरण नहीं करता। ‘पुस्तक अध्यात्मिकता क्यों ? लेखक पार्थ सारथी राजगोपालाचारी पृष्ठ 16,17,18

भारत एक दार्शनिक देश है। तत्वदर्शन का स्थान सर्वोपरि है। अध्यात्म ही इसका प्राण है। यहाॅ राष्ट्र को देवता और वसुधा को कुटुम्ब माना गया है। एक-एक शब्द ब्रह्म तत्व का प्रकाशक है। इसलिए शब्द को हमने ब्रह्म माना है।

अध्यात्मिकता याद करने की एक कला है और इसी से संबंधित विज्ञान भी है। जहाॅ से हम संसार में आये है उस असली घर को भौतिकता के चक्कर में भूल गये हैं। उस घर की याद दिलाने तथा लौटने की प्रक्रिया को अध्यात्मवाद कहते हैं। अज्ञानता वस जीवन के एकांगी अर्धभाग भौतिकता पर विचार करते हैं किन्तु अर्धभाग अध्यात्म पर ध्यान नहीं दें, तो जीवन अधूरा हो जाता है।

धर्म प्रारम्भिक शिक्षा तो दे सकता है किन्तु उसकी वयस्क अवस्था में उच्चत्तर प्रगति तो केवल अध्यात्म द्वारा सम्भव है। अध्यात्म अपने सभी पहलुओं में सहस्यवाद के समकक्ष माना जा सकता है। धर्म ईश्वर की खोज में लगे मनुष्य के मन को बहिर्मुख करता है, जबकि अध्यात्म इस खोज को अन्तर्मुख करता है और मन को हृदय की ओर मोड़ता है, जहाॅ से वास्तव में खोज शुरू होनी चाहिए। सभी का मत है ईश्वर हमारे अन्दर है। जब मानव ईश्वर को अपने से बाहर कहीं खोजता है तो पहली चीज जो उसकी दृष्टि से ओझल हो जाती है या उसका सम्पर्क टूट जाता है, वह है स्वयं अपने से। लक्ष्य कहीं बहुत दूर प्रायः अस्तित्व के किसी ऐसे आयाम में इतनी दूर किया जाता है, जहाॅ तक पहुॅचना हमारे लिए सम्भव ही न हो।

इसके विपरीत आध्यात्मिकता मनुष्य का ध्यान उसके हृदय में प्रसारित होने वाली दिव्य प्रभा की ओर केन्द्रित करती है, जिस प्रभा की रचना सृष्टा ने स्वयं मनुष्य के हृदय में अपनी उपस्थिति से की है। हमारे भीतर विद्यमान होने के कारण ऐसा ईश्वर न केवल हमारी पहुॅच के दायरे में होता है बल्कि तत्काल सुलभ भी होता है। परम सत्ता से जो अपेक्षा करती है, वह बस यह है कि हमारा ध्यान अन्दर के उस ‘पुरूष’ पर केन्द्रित रहे। इस प्रकार स्पष्ट रूप से दोनों में यानी धर्म और अध्यात्म में, अध्यात्म मनुष्य जीवन के ध्येय को प्राप्त करने का कहीं आसान तरीका है। यदि आध्यात्मिकता का अभ्यास ईश्वर प्राप्ति के एक विनम्र प्रयास के रूप में व्यापक स्तर पर किया जाये तो सम्भवतः यह एकता उत्पन्न करने वाली एक प्रबल शक्ति बन सकता है। अध्यात्मवाद में सम्पूर्ण चित्र के स्थान पर चरित्र परिवर्तन ही श्रेष्ठता का परिचायक है।

मनुष्य की विदित क्षमता सीमित है जिसका प्रयोग हो चुका है परन्तु अविज्ञात शक्ति, क्षमता का कोई सीमा अथवा अन्त नहीं है। सुख सुविधा के प्रयास में अनवरत लगा है।

समस्याओं के दल-दल तथा व्यूह रचना में फंसे मानव को वैज्ञानिक अध्यात्मवाद त्राण दिला सकने में सक्षमह ै। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद संघर्ष को छोड़कर सामंजस्य तथा समग्रता की पद्धति है। यहाॅ भौतिकता का आध्यात्मिक के साथ, व्यक्ति का समाज के साथ और श्रद्धा का तर्क के साथ अपूर्व मिलन-दृष्टिगोचर होता है।

आज का व्यक्ति ;औसतद्ध उच्चस्तरीय भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति के लिए बहुत विचार एवं शक्ति खर्च करता है। असंतुलित प्रयास हो रहे हैं। मानव अस्तित्व दो आयामों पर आधारित है। भौतिक एवं आध्यात्मिक और दोनों ही व्यक्ति से समरस और सुखद जीवन के लिए महत्वपूर्ण और अनिवार्य है। अध्यात्म विद्या के विज्ञान के दो पक्ष तथा प्रयोजन हैः-

एक अन्तराल की प्रस्तुत विभूतियों का जागरण दूसरा अनंत ब्रह्माण्ड से व्याप्त ब्राह्मी चेतना का अनुग्रह अवतरण। इस दिशा में बढ़ने के लिए दो नाम है:- परिशोधन और परिष्कार। परिशोधन अर्थात् संचित कशाय-कलमषों का, संस्कारों का, दुष्कर्मों के प्राख्धर संचयका निराकरण। परिष्कार अर्थात् प्रेष्ठता का जागरण अभिवर्द्धन। परिशोधन को तपश्चर्या कहते हैं और परिष्कार को योग-साधना।

तप में सीमा रेखा शरीर तक नहीं मन और प्राण भी संलग्न है। तप की प्रकिया –   (1) संयम, (2) परिशोधन, (3) जागरण। तप के प्रकार – मानसिक, वाचिक तप एवं शारीरिक तप – सामवेद के अनुसार, सब प्रकार के तपों से तृप्त तपस्वी ही परमात्मा को प्राप्त करने की शक्ति रखता है तथा तप से आत्मा प्रसन्न होती है।

तप की 12 राशियां हैं – 1- अवसाद तप, 2- तिपीक्षा तप, 3- कर्षण तप, 4- उपवास, 5- गव्यकल्प तप, 6- प्रदातव्य तप, 7- निष्कासन तप, 8- साधना तप, 9- ब्रह्मचर्य तप, 10- चांद्रायण तप, 11- मौन तप, 12- अर्जन तप

सभी तपों के ऊपर ‘परमतप’ है। तप अध्यात्म का आधार है। योग अर्थात् जीवन साधना –

पतंजलि ने कहा है

‘‘चितवृत्ति निरोधस्य योगः !’’

चितवृतियों का निरोध, शोध नही योग है।

इसे अध्यात्म का आधार कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

वैज्ञानिक अध्यात्मवाद मात्र कुछ सिद्धान्तों या तत्वदर्शन तक सीमित नहीं है। तत्वदर्शन एवं सिद्धान्त तो इसका ज्ञान पक्ष है। इसके अतिरिक्त इसका विज्ञान पक्ष भी है, परन्तु वर्तमान में यह प्रायः क्षीण है। इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि हमारे प्राचीन अध्यात्म की केवल ज्ञान शाखा जीवित है, विज्ञान शाखा विलुप्त हो गई है। इसके प्रभाव से मानव के शरीर, प्राण व मन में अभीष्ट परिवर्तन हो सकेगे और वह क्रिया, भावना एवं चिंतन की दृष्टि से उत्कृष्ट बनेगा।

सार संक्षेप यही कहा जा सकता है कि वैज्ञानिक अध्यात्मवाद बुद्धि का खेल है। अध्यात्मतो सर्वेशुद्ध हल की तरह प्रमाणित है। आज जितने प्रयोग हो रहे हैं प्राचीन की तुलना में बौद्धिकता अधिक तथा व्यावहारिक कम है।

अथर्ववेद में लिखा गया है:- ;10/12/31द्ध

अष्टाचक्रा नव द्वारा देवाना पूरयोध्या।

तस्यां हिरण्भयः कोगः स्वगीज्योतिषाव्रत।।

इस देह में आठ चक्र और नौद्वार है, देवशक्तियों की पुरी नगरी। यह अयोध्या है उसमें जो तेजस्वी कोश है, वही तेजस्विता से युक्त होकर स्वर्गीय आनन्द से परिपूर्ण है।

मानव जीवन में आध्यात्मिक सम्भावनाए निम्नांकित हैः-

  1. प्रतिमा परिष्कार
  2. अन्तर्पदों से मुक्ति
  3. संवेदनाओं का विस्तार
  4. संकल्प शक्ति का विकास
  5. अंतदृष्टि का विकास
  6. अंतोद्रिय क्षमताओं का विकास

अध्यात्मिक प्रतिभाओं को नियमों से परे एवं असीम बताया गया है।

गीता के सोलहवें अध्याय में लिखा हैः-

अभयं सत्वयंशुद्धिज्र्ञान योग व्यवस्थिति:।

दान दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप अर्जवम् ।।1।।

अहिंसा सत्यम क्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।

दयाभूतष्व लोलुप्तं मार्दवं ही रचाजलम् ।।2।।

तेजः क्षमा घृतिः शौच म द्रो हो नातिमानिता।

भवन्ति सम्पद दैवीमभिजातस्य भारत ।।3।।

भगवान ने कहा – हे भरत पुत्र निर्भयता, आत्मशुद्धि, आध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन, दान, आत्मसंयम, यज्ञ परायणता, वेदाध्ययन, तपस्या, सरलता, अहिंसा, सत्यता, क्रोधविहीनता, त्याग, शान्ति, छिद्रान्वेषण में अरूचि, समस्त जीवों पर करूणा, लोभविहीनता, भद्रता, लज्जा, संकल्प, तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, ईष्र्या तथा सम्मान की अभिलाषा से मुक्ति ये सारे दिव्य गुण हैं, जो दैवी प्रकृति से संपन्न देवतुल्य पुरूषों में पाये जाते है। भौतिक परिस्थितियां शोधनीय होने पर भी यदि सभी वर्णों के लोग उपर्युक्त वर्णित 26 गुणों का अभ्यास करें तो, वे क्रमशः अध्यात्मिक अनुभूति के सर्वोच्च पद पर पहुॅच सकते है।

उपरोक्त कथोपकथन को गंभीरतापूर्वक शोधकर देखा जाय तो सारांश निकालने में सुविधा होगी। उन सार संसार में मनुष्य मरने के लिए जी रहा है फिर भी जीवन को सार्थकता प्रदान करने के लिए भौतिकता अध्यात्मिक प्रयास करता रहता है। वर्तमान दुनिया में भौतिकता का प्रभाव है। सम्प्रति अध्यात्म प्रशिक्षण लाभ-हानि पर विशद विवेचन की आवश्यकता है। अध्यात्मवाद से होने वाले लाभ को विस्तार से प्रचारित करना तथा उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। पूरा काल में सभी कथन जीवन के आवश्यक कार्य जाॅचे परखे थे। प्राचीन अर्वाचीन की तुलना में दृंेय है ऐसे विचार सर्वधा गलत है।

वैज्ञानिक अध्यात्मवाद स्वयं सिद्ध विज्ञान है। महापुरूषों की श्रेष्ठता से प्रमाणित है कि पंचभूत निर्मित मानव अध्यात्म के बल पर ‘नर से नारायण’ बनकर दिखा दिया है। शरीरधारी, नश्वर शरीर होते हुए भी ऋषि, मुनि, महर्षि, संत, महात्मा, महापुरूष बनकर धरा धाम को अकूत साहित्य जीवन दर्शन देकर अमर हो गये।

महाभारत में कहा गया है मार्ग न मिले तो क्या करें ? संकेत तथा निर्देश प्राप्त होता हैः-

‘‘महाजनों येनः गताः सपंथा।।’’

अर्थात् महापुरूष जिस मार्ग गये या बताये वही मार्ग है। महर्षि विश्वामित्र नई सृष्टि करने की शक्ति अर्जित किये। वेदव्यास की रचना महाभारत जगत प्रसिद्ध है। द्रोण, भीष्म, अर्जुन रजपुत्र होकर भी अमर विभूति हजारों वर्षों तक है।

मीरा, संत रविदास, नानक, गुरूगोविन्द सिंह देवत्व प्राप्त कर गये।

संदर्भ ग्रन्थ:-

  1. आध्यात्मिकता क्यों ?
  2. व्यक्तित्व परिष्कार – आध्यात्मिक जीवन – गायत्री कुंज, हरिद्वार
  3. श्रीमद् भगवत गीता – श्री भक्ति वेदान्त स्वामी प्रभुपाद भक्ति वेदान्त बुक ट्रस्ट, मुम्बई

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पुष्कल

पुष्कल- इस नाम का शाब्दिक अर्थ है प्रचुर , परिपूर्ण।
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