धर्म निरपेक्षता और पंथ निरपेक्षता

admin/ September 29, 2020

सृष्टि के प्रारम्भ काल से आज तक निर्माण एवं विध्वंस होता आ रहा है। सृजन और विनाश दो स्तरों पर होता है प्रथमतः प्रकृति अथवा ईश्वर द्वारा तथा द्वितीय स्तर पर देखा जाय तो मानव द्वारा किये गये निर्माण तथा विनाश। मानव द्वारा निर्मित व्यवस्थाएॅ, विषय, भाषाएँ, शासन प्रणाली तथा जीवन पद्धतियाॅ अनेक प्रकार की है। उसी क्रम एवं कड़ी में राजनीति शास्त्र, लोकतंत्र, राजनीतिज्ञ जैसे शब्दों का आविष्कार हुए है। भाषा के नाम पर संस्कृत, हिन्दी, लैटिन, अंग्रेजी, फारसी, उर्दू प्रचलित हुए है। राजनेताओं तथा राजनीति शास्त्र के विद्वानों ने भाषा के माध्यम से अनेक बातों, प्रसंगों, शब्दों को प्रस्तुत किए हैं। शब्दों की श्रृंखला में साम्प्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता, पंथ-निरपेक्षता, सेक्यूलिरिज्म जैसे शब्दों का प्रयोग बेहिचक किये गए हैं।

भारतीय संविधान के नाभितत्व ये शब्द हो गये हैं। साथ ही साथ संविधान भारतीय जीवन का ‘साधन नहीं साध्य’ होता जा रहा है जबकि अनेक संशोधन और खंडन-मंडन भी हुए हैं।

किसी शब्द की आत्मा और भावार्थ समझने के लिए इन आधारों का होना आवश्यक है यथा-व्युत्पत्ति के आधार, व्याकरण, ग्रन्थों आधार, विद्वानों के मतानुसार, संविधानों, प्रयोगों तथा प्रमाणों के आधार। यहाँ हमारे अपने देश के राजनीति में प्रयुक्त होने वाले जिस शब्द की व्याख्या तथा शाब्दिक अर्थ पर विचार करने जा रहे हैं और वह महत्वपूर्ण शब्द है ‘धर्मनिरपेक्षता’।

भारतीय वामपंथ में ‘धर्म’ शब्द की अवधारणा निम्नवत् है अर्थात् ‘धारयति इति धर्मः’ परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधभाई। स्मृति में भी धर्म के दस लक्षण गिनाये गये हैं।

धर्मनिरपेक्षता शब्द का भावार्थ अथवा शब्दार्थ होगा धर्म-रहित, धर्मविहीन, निधर्मी, अर्थात् वह व्यवस्था जो धर्म और सदाचार से विलग रहे। इसकी पुष्टि में राजनीति तथा विश्व संगठन न्ण्छण्व्ण् में प्रयुक्त शब्द गुट निरपेक्षता को ले सकते हैं। भारत तथा दुनियाँ के कुछ देश गुट से अलग हैं अथवा गुटरहित हैं। इस आधार पर जोरदार ढंग से तथा प्रमाणिकता के साथ कहा जा सकता है कि भारतीय राजनीति में ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द का प्रयोग सर्वथा अनुचित तथा संविधान के भावना के विपरीत है। जिस प्रकार ताप रहित अनल की कल्पना नहीं कर सकते उसी प्रकार धर्मरहित ; धर्मनिरपेक्ष शासन एवं संस्कार की कल्पना नहीं कर सकते। 

हाॅ संविधान की आत्मा के अनुरूप कोई शब्द है तो पंथ निरपेक्ष है। रिलीजन धर्म शब्द का पर्याय कदापि नहीं हो सकता।

धर्म निरपेक्षता नहीं वरन पंथ निरपेक्षता के वर्तमान स्वरूप पर विवेचना करने के पूर्व कुछ तथ्यों का उल्लेख आवश्यक प्रतीत होता हैं।

क्हा जाता है कि शब्द ब्रह्म होता है। उसके प्रयोग से अच्छे तथा भयानक परिणाम निकलते हैं। ईसा मसीह ने भी कहा था कि ‘शब्द मृत्यु प्रदान करता है तथा उसका भाव जीवन प्रदान करता है’ प्रसिद्ध विद्वान ‘वाल्टेयर’ ने कहा है कि अगर तुम मुझसे बात करने की इच्छा रखते हो तो सर्वप्रथम अपने द्वारा प्रयोग करने वाले शब्दों की परिभाषित करो। व्याकरण के शीर्षस्थ पुरोधा पाणिनी भी कह गये कि ‘एकः शब्दः सम्यक् ज्ञातः सम्प्रयुक्तः लोके स्वर्गे च काम धुक भवति…’ अर्थात् शब्द एक मंत्र है और उसका उपयुक्त ज्ञान तथा उचित प्रयोग अपेक्षित फल देता है।

लेकिन वर्तमान समय में देश के कुछ राजनेता एवं बुद्धिजीवी, पत्रकार, टी0वी0, रेडियो जनता को शब्दों की उपयुक्त जानकारी नहीं दे रहे हैं। सम्पूर्ण देश भ्रम में पड़ा है। इसे शब्द जाल कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। धर्मनिरपेक्षता, सेक्युलिरिज्म, साम्प्रदायिकता, सामाजिक न्याय जैसे शब्दों द्वारा भ्रम अधिक लाभ कम हुआ है। धर्म-निरपेक्ष शब्द का प्रयोग हमारे देश में जिस भावार्थ में किया जा रहा है उस प्रकार से संसार के किसी देश में नहीं किया जाता है। वास्तव में सेकुलर का अर्थ होता है ‘इहवादी अथवा इहलौकवाद’ पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी सार्थक संज्ञा दी थी ‘असाम्प्रदायिक’।

संविधान सभा में हुए विचार विमर्श के साथ-साथ श्री पी0सी0 चटर्जी की पुस्तक ‘सेकुलर भेल्युज फाॅर सेकुलर इण्डिया’ के प्रकाशन के समय तक इस पर चर्चा होती रही। ‘सेकुलररिज्म’ का व्यावहारिक अर्थ बाईबिल की भाषा में ‘सीजर’ ;राजाद्ध को वह दो जो सीजर का है और ईश्वर को वह दो जा भगवान का है। इसका तात्पर्य है कि राजकर्म और पंथकर्म को पृथक-पृथक माना गया है। भारत की राज संस्थाएं स्वभावतः पंथनिरपेक्ष ही रही है। परन्तु शासन धर्मसापेक्ष अर्थात् नैतिकता एवं सदाचार से युक्त था। फर्डिनाड एवं इसाबल के कूरतम धार्मिक न्यायपीठ की कल्पना भी हमारे देश में नही की जा सकती। परन्तु ‘सेक्युलर’ अर्थात् विधर्मी की धारणा भी गलत है।

डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर कहते थे कि सेक्युलर राज्य का अर्थ यह नहीं है कि धार्मिक भावनाओं का सम्मान नहीं होगा। पंथ निरपेक्षता का अर्थ है कि संसद और सरकार किसी पर भी उपासना पद्धति या पंथ को थोप नहीं सकती।

सेक्युलिरिज्म ;पंथ निरपेक्षद्ध शब्द पर भी वाद-विवाद अथवा चर्चाएं होती है वह पश्चिम से अनुप्रमाणित है। सम्राट काॅस्टाटाइन ने ईसाई पंथ स्वीकार करने के पश्चात् ईसाई पंथ को अपने सम्पूर्ण राज्य पंथ घोषित किया और 346 ई0 में उसने उन सभी पूजा तथा उपासना स्थलों को बंद कराने का आदेश निर्गत किया जो ईसाई पंथ के नहीं थे।

राजनीति क्षेत्र में सेकुलरिज्म का पदार्पण उन घटनाओं के फलस्वरूप हुआ जब 1832 के रिफार्म बिल बनने की प्रक्रिया में था। सेकुलरिज्म की भावना को राबर्ट ओवन के समाजवाद और चार्टिस्ट आन्दोलन से भी प्रेरणा मिली। लेकिन सेकुलरिज्म ;पंथ निरपेक्षद्ध का यह नाम काफी समय बाद मिला। इसवत क्षेत्र जार्जजेकन हाॅलीआक को है। 1846 में अपनी पुस्तक ‘प्रिंसीपल आफ सेक्युलिरज्म’ में प्रयोग किया था।

भारतीय राजनीति एवं संविधान दोनों में अटूट सम्बन्ध है परन्तु संविधान का मूल प्रकाशन एवं भाषा अंग्रेजी है। उसमें सेक्युलर और रिलीजन शब्दों का प्रयोग वर्तमान सभी भ्रान्तियों एवं विसंगतियों का मूल हो गया है क्योकिं ये शब्द भारत की आत्मा, संस्कृत एवं हिन्दी शब्दावलीयों, प्रयोगों को समझने तथा उपयुक्त भाव प्रगट करने में सवर्था असमर्थ हैं। संविधान निर्माताओं का यही आशय था कि पंथ-निरपेक्ष अर्थात् पंथों, मजहबों का सम्मान या यों कहें कि ‘सर्वपंथ समभाव’ होगा।

दुर्भाग्य है देश के वर्तमान राजनीति एवं ‘‘राष्ट्र जीवन की दिशा का’’ क्योंकि कुछ राजनेता, दल, बुद्धिजीवी, धर्मनिरपेक्षता, पंथ निरपेक्षता, साम्प्रदायिकता जैसे शब्दों को सही संदर्भ में प्रस्तुत नहीं करते है। मात्र अपनी सुविधा एवं स्वार्थ से प्रेरित होकर प्रयोग कर रहे हैं। इसके कुछ अपवाद भी हो सकते है। कुछ लोग तो लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत करते हैं परन्तु स्वतंत्रता और उछृंखलता की मध्य की रेखा को समाप्त कर स्वार्थ सिद्धी में लगे हैं।

उपर्युक्त तथ्य तथा कथ्य की पुष्टि में कुछ उदाहरणों को रेखांकित किया जा सकता है – मुस्लिम पर्सनल लाॅ और सिविल कोर्ट में विरोधाभास जारी है। घुसपैठियों को बढ़ावा एवं मतदान सूची में सूचिबद्ध किया जा रहा है। विधान के समक्ष सभी समान है फिर भी पंथ निरपेक्षता के नाम पर शाहबानों कांड मुकदमा में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किये गये फैसले को देश के लगभग 410 कांग्रेसी सांसदों ने निरस्त कर दिया। यह मुस्लिम बहनों के साथ न्याय है ? पंथ निरपेक्षता एवं संविधान का इसी प्रकार सम्मान होगा ? यह तो राजनीति की विवशता और स्वार्थपरता है।

संविधान के समक्ष सभी समान और स्वंतत्र होते हुए भी अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक धड़ों में बाॅटा गया है। जब अधिकार और कर्तव्य नागरिकों का सम्मान है तो विभाजन क्यों ? समयबद्ध सरकार तथा दल समस्या का हल करें और जातीयता, साम्प्रदायिकता, क्षेत्रीयता के आधार पर देश को न बांटे, न चुनाव लड़ें।

वर्तमान समय के अधिकांश लोग धर्म की अवधारणा भूल कर निजी स्वार्थ के वशीभूत होकर कथनी तथा करनी में साम्य नहीं रखतें। कुछ दल तो क्षेत्रीयता, जातियता, साम्प्रदायिक समीकरण ‘माय’ का उल्लेख करते है और ‘भूरा बाल को साफ करो’ का नारा देते हैं फिर भी वे असम्प्रदायिक तथा पंथ निरपेक्ष कहलाना चाहते हैं। सभी दलों के देख-रेख में अयोध्या कांड, अमृतसर कांड, चरारे शरीफ कांड, रूबिया कांड, उड़ीसा कांड, पंथ एवं धर्म परिवर्तन कांड और काश्मीर के तीन लाख लोग विस्थापित होकर भटक रहें हैं। कांग्रेस के शासन काल में 2400 दंगे हुए परन्तु आर0 एस0 एस0 वाले नहीं पकड़े गये झूठा आरोप लगता रहा फिर भी कहा जाता है भारत महान है और पंथ निरपेक्ष संविधान है।

सन् 1992 में कांग्रेस के अध्यक्ष तथ प्रधानमंत्री के रूप में माननीय नरसिंहा राव ने ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द की परिभाषा निश्चित करने के लिए सम्पूर्ण देश में विचार-विमर्श तथा बहश कराने की बात कही थी। अर्थात् उस समय तक ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द की व्याख्या एवं अर्थ एवं प्रयोग उपयुक्त रूप में नहीं हो रहा था। सम्प्रति यथा स्थिति बनी हुई है।

महात्मा गाॅधी, सम्पूर्णानन्द, लोकमान्य तिलक को समय≤ पर भुनाने वाले लोग, उनके द्वारा दिये गये निर्देशों तथा कथनों को भूल जाते हैं। वे महापुरूष कह गये थे कि – धर्म तथा मजहब एक – दूसरे के पर्याय तथा पूरक नहीं हैं, अंग्रेजी शब्द – ‘रिलीजन’ का उपयुक्त अनुवाद या शब्दार्थ ‘धर्म’ शब्द नहीं है।

भारत के कुछ राजनेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार, लेखक शब्दों का गलत प्रयोग एवं व्याख्या कर अपनी अयोग्यता प्रकट करना चाहते हैं अथवा धूर्तता ?

हमस ब जानते अथवा जानना भी चाहिए कि भारतीय संविधान के अन्र्तगत कार्यपालिका, विधायिका, न्याय पालिका का प्रावधान किया गया है। उसी क्रम में अनेक आयोगों का भी गठन हुआ है। उसके फलस्वरूप एक शक्तिशाली भारतीय चुनाव आयोग भी गठित है। संवैधानिक दायरे में रहते हुए चुनाव आयोग भी साम्प्रदायिक्ता की परिभाषा प्रस्तुत करते हुए प्रमाण भी दे। रेखांकित साम्प्रदायिक दलों तथा नेताओं को मान्यता न दी जाय। साथ ही साथ चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाकर अपने नैतिक तथा संवैधानिक दायित्व का निर्वाहन करें अथवा कथित पंथनिरपेक्ष दल न्यायालय में मुकदमा दर्ज कराकर साम्प्रदायिक दलों, गैर पंथनिरपेक्ष दलों तथा नेताओं को अमान्य कराकर चुनाव लड़ने से वंचित करा दें अन्यथा निर्लज्य प्रलाप बंदकर मुद्दों, चरित्रों, त्यागों, अनुभवों, कार्यों पर सार्थक बहस छेड़ें।

कांग्रेस ही अच्छा दल, अच्छा नेतृत्व, अच्छा प्रशासन 45 वर्षों से देता रहा तो किसी विरोधी दल बनाने का क्या औचित्य था ? अगर कांग्रेस का विरोध कर भूल करते रहें तो प्रायश्चित के लिए तथा कथित पंथनिरपेक्ष दल कांग्रेस के पीछे चलें और धर्म निरपेक्षता, जातीयता, तुष्टिकरण, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, साम्प्रदायिकता दंगे, अवसरवाद को बढ़ाते हुए वंशवाद, विदेश नेतृत्व को बढ़ाते रहे और अपना निजी स्वार्थ साधते रहे। मा. मुलायम जी, श्री रामविलास पासवान जी, श्री लालू जी सम्पूर्ण क्रांति तथा समाजवाद लाने के लिए कांग्रेसी नेतृत्व को स्वीकार कर लें। 45 वर्ष 14 वर्ष का हिसाब देते हुए, 6 वर्ष का हिसाब मांगें। यह राजनीतिक दलों का देशवासियों का अधिकार एवं कर्तव्य है।

निष्कर्षतः कहा जाय कि वर्तमान पंथ निरपेक्षता का स्वरूप संविधान में प्रावधान उपबंध के कारण नहीं है बल्कि भारतीयता की सोच एवं संस्कृति की देन है। इस्लामिक देशों तथा इसाई पंथ वाले राज्यों में भारत जैसा पंथ निरपेक्षता देखने को नहीं मिलती। यह भारतीय संस्कृति और परम्परा तथा आत्मा की विशेषता है। एक समय था जब इस्लाम, जैन, ईसाई, बौद्ध पंथ का जन्म नहीं हुआ था तब भी भारत की शासन व्यवस्था तथा राजतंत्र धर्मानुसार कार्य करते थे।

एक विनम्र आग्रह एव ंअपेक्षा शेष है कि बुद्धिजीवी, राजनेता, संघपरिवार और विचारक निर्भय होकर शब्द जाल को तोड़ें और उचित एवं सार्थक परिभाषा धर्मनिरपेक्षता, साम्प्रदायिकता, क्षेत्रीयता, राष्ट्रीयता तथा जातीयता का प्रस्तुत करें।

अंततः सेक्लुरिज्म अर्थात् पंथ निरपेक्षता शब्द की उचित व्याख्या कर हमस ब ‘‘अतीत को सम्मान वर्तमान को समाधान और भविष्य को दिशा निर्देश देने में’’ सक्षम होंगे, ऐसा मेरा विश्वास हैं।

फटा हुआ है माॅ का आंचल इसे हमें सीना है।

देखें कौन लहू देता है, देता कौन पसीना है।।

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पुष्कल

पुष्कल- इस नाम का शाब्दिक अर्थ है प्रचुर , परिपूर्ण।
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यह एक स्मारिका के तरीके से भी प्रकाशित की जा रही है जहाँ पर आप कई प्रबुद्ध व् बुद्धिजीवी लोग और उनके विचार का संकलन भी आप पढ़ पाएंगे।